शरीर दान: क्या है, क्यों करें और कैसे शुरू करें

आपने कभी सोचा है कि जब आप नहीं रहे तो आपका शरीर मददगार बन सकता है? यही शरीर दान का मूल विचार है। यह सिर्फ अंगों के लिए नहीं, बल्कि पूरे शरीर को मेडिकल रिसर्च में इस्तेमाल करने की अनुमति देता है। अगर आप सही जानकारी रखें तो प्रक्रिया बिलकुल आसान रहती है।

शरीर दान के मुख्य फायदे

पहला फायदा है दूसरों की ज़िंदगी बचाना। कई बार रोगियों को ट्रांसप्लांट के लिए तुरंत अंग नहीं मिलता, लेकिन एक पूरी तरह से दान किया गया शरीर वैज्ञानिकों को नई तकनीक सीखने में मदद करता है। दूसरा लाभ समाज में जागरूकता बढ़ाता है – जब लोग देखते हैं कि दान ने कितनी ज़िंदगियां बचाईं, तो और लोग भी हिस्सा बनना चाहते हैं। तीसरा, आपके परिवार का भावनात्मक बोझ कम होता है क्योंकि उन्हें पता रहता है कि उनका प्रियजन कुछ अच्छा कर रहा है।

शरीर दान की आसान प्रक्रिया

सबसे पहले आप अपने इच्छाओं को लिखित रूप में दर्ज करें या किसी भरोसेमंद संस्था के साथ पंजीकरण करवाएँ। भारत में कई गैर‑सरकारी संगठनों और अस्पतालों ने ऑनलाइन फॉर्म उपलब्ध कराया है। अगला कदम है डॉक्टर से मिलकर स्वास्थ्य जांच कराना; अगर कोई गंभीर रोग नहीं है तो आपका नाम दाताओं की लिस्ट में जुड़ जाता है। मृत्यु होने पर अस्पताल या आपकी पसंदीदा संस्था को सूचना देती हैं, फिर शरीर को सुरक्षित तरीके से रिसर्च लैब या मेडिकल कॉलेज भेजा जाता है। पूरा काम कुछ ही दिनों में हो जाता है, और परिवार को भी पूरी जानकारी दी जाती है।

कई लोग सोचते हैं कि दान करने से धार्मिक समस्याएँ आती हैं, पर हिन्दू, मुस्लिम, सिख सब धर्मों ने इसे सम्मान की बात माना है। अगर आप शंका में हों तो अपने पुजारी या मौलवी से सलाह ले सकते हैं – अधिकांश ने इसको सकारात्मक रूप में ही देखा है।

एक और आम सवाल ये होता है कि दान के बाद शरीर का क्या होता है? सामान्यतः इसे मेडिकल कॉलेजों में एन्हांस्ड ट्रेनिंग, सर्जिकल अभ्यास या नई दवाओं की टेस्टिंग में इस्तेमाल किया जाता है। अगर आप चाहें तो कुछ संस्थाएँ आपके परिवार को रिपोर्ट भी देती हैं कि आपका शरीर कैसे उपयोग हुआ।

ध्यान रखें, यदि आप पहले से किसी बीमारी का इलाज कर रहे हैं जैसे कैंसर या एचआईवी, तो दान नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में भी आप रक्त या प्लाज़्मा दान करके मदद कर सकते हैं। यह छोटे‑छोटे कदम बड़ी बदलाव ला सकते हैं।

कभी-कभी लोग सोचते हैं कि दान से जीवनकाल घट जाता है, लेकिन वास्तव में दान की प्रक्रिया पूरी होने पर मृत्युपर्यंत कोई असर नहीं पड़ता। डॉक्टरों का मानना है कि यह एक नैतिक फ़ायदा देता है और सामाजिक रूप से भी बहुत सराहनीय होता है।

अगर आप अभी भी undecided हैं तो अपने परिवार के साथ खुलकर बात करें। अक्सर लोग डर या अनिश्चितता के कारण पीछे हटते हैं, पर जब सबको स्पष्ट जानकारी मिलती है तो सहमति बन जाती है। याद रखें, दान आपका व्यक्तिगत निर्णय है और इसे किसी दबाव से नहीं लेना चाहिए।

अंत में, यदि आप शरीर दान करने का विचार कर रहे हैं तो कलाकृति प्रकाश पर उपलब्ध मुफ्त गाइड डाउनलोड करें। इस गाइड में सभी जरूरी फॉर्म और संपर्क जानकारी दी गई है, जिससे आपका पहला कदम आसान हो जाएगा।

अक्तू॰, 14 2024
जी.एन. साईबाबा की पार्थिव देह अस्पताल को दान करने का निर्णय

जी.एन. साईबाबा की पार्थिव देह अस्पताल को दान करने का निर्णय

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा की पार्थिव देह उनके परिवार ने उनके इच्छा के अनुसार अस्पताल को दान करने का निर्णय लिया है। साईबाबा का निधन 12 अक्टूबर 2024 को 58 वर्ष की आयु में हुआ। वह आदिवासी अधिकारों के समर्थक और सरकारी नीतियों के आलोचक थे।

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