ग्राहम थॉर्प – इंग्लैंड के शेरदर्द की कहानी
अगर आप क्रिकेट पसंद करते हैं, तो ग़ौर करना पड़ेगा कि ग़्रहाम थॉर्प नाम अक्सर सुनते हैं। वह 1970‑के दशक में जन्मे और 1993 से 2005 तक इंग्लैंड के टेस्ट टीम में खेले। बॉलिंग के बाद उनका बैटिंग स्टाइल बहुत भरोसेमंद था, इसलिए कई बार मैचों को बचाया।
करियर का सार
ग़्रहाम ने कुल 100 टेस्ट मैचों में 7,800 से ज्यादा रन बनाए, औसत लगभग 45. थॉर्प की सबसे बड़ी इनिंग 200‑वॉक के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया थी। उस दिन उन्होंने 184 रनों पर टीम को जीत दिलाई। उनके पास 13 शतक और 36 अर्धशतक थे, जो दिखाते हैं कि वह हमेशा दबाव में बेहतर खेलते थे।
वनडे में भी उनका योगदान कम नहीं था – 70 से ज्यादा मैचों में उन्होंने 1,500 रनों का योगदान दिया। जबकि उनकी औसत वनडे में 25 के करीब थी, लेकिन जब टीम को जरूरत होती तो वह अक्सर मध्य‑ऑर्डर पर अड़े और स्थिरता लाई।
ग़्रहाम थॉर्प के बाद के काम
खेल से रिटायर होने के बाद थॉर्प ने कोचिंग की दिशा ली। उन्होंने इंग्लैंड की अंडर‑19 टीम का हेड कोच बनकर युवा खिलाड़ियों को तकनीकी और मानसिक सलाह दी। इस दौरान कई उभरते स्टार उनके मार्गदर्शन में आगे बढ़े।
आज भी वह विभिन्न टेलीविज़न चैनलों पर क्रिकेट विश्लेषक के रूप में दिखाई देते हैं। जब कोई बड़ा मैच आता है, तो उनकी राय सुनने वाले दर्शकों की संख्या काफी होती है। उनका बोलना सीधा‑सादा और समझने लायक होता है, इसलिए श्रोताओं को जटिल तकनीकी बातें भी आसान लगती हैं।
भारत में भी उनके नाम पर कई चर्चा चलती रहती है। अक्सर भारतीय क्रिकेट फ़ोरम या सोशल मीडिया ग्रुप्स में उनका करियर याद किया जाता है, खासकर 1990‑2000 के दौर की तुलना आज के खिलाड़ियों से करने के लिए। इस वजह से ग़्रहाम थॉर्प का नाम अभी भी लोकप्रिय है।
अगर आप उनके करियर या कोचिंग टिप्स के बारे में और जानना चाहते हैं, तो हमारी साइट पर मौजूद पुरानी इंटरव्यूज़ और मैच रिव्यू पढ़ सकते हैं। यहाँ तक कि कुछ वीडियो क्लिप भी उपलब्ध हैं जहाँ थॉर्प ने अपने खेलने के अनुभव साझा किए हैं।
समाप्ति में कहना चाहूँगा – ग़्रहाम थॉर्प सिर्फ एक पुराना खिलाड़ी नहीं, बल्कि वह एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसने कई नई पीढ़ियों को प्रेरित किया है। उनकी कहानी पढ़कर आप समझ पाएँगे कि कैसे निरंतर मेहनत और सच्ची लगन से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।