मूर्लीकांत पेटकर: भारत के प्रथम पैरालिम्पिक स्वर्ण विजेता
अगर आप भारतीय खेल इतिहास की बात करें तो एक नाम ज़रूर याद आएगा – मूर्लीकांत पेटकर। उन्होंने 1964 में टोक्यो पैरालिम्पिक में तैराकी में स्वर्ण पदक जीत कर भारत को पहली बार इस मंच पर लाया। उनकी कहानी साधारण नहीं, बल्कि संघर्ष और दृढ़ता का एक शानदार उदाहरण है।
जीवन की शुरुआत और चुनौतियाँ
मूर्लीकांत का जन्म 1944 में महाराष्ट्र के छोटे से गाँव में हुआ था। बचपन में ही दुर्घटना के कारण उन्होंने पैर खो दिया, लेकिन यही वजह नहीं बनी उनका रास्ता रोकने वाली। सरकारी नौकरी करते हुए उन्होंने तैराकी को शौकिया तौर पर शुरू किया और धीरे‑धीरे अपनी तकनीक निखारी। स्थानीय प्रतियोगिताओं में लगातार जीत हासिल करने के बाद उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर चयन मिला।
टोक्यो 1964: इतिहास बन गया
टोक्यो पैरालिम्पिक में मूर्लीकांत ने 50 मीटर फ्रीस्टाइल इवेंट में भाग लिया। कई लोग सोचते थे कि भारतीय खिलाड़ी यहाँ नहीं टिक पाएगा, पर उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया और गोल्ड मेडेल जीत ली। उनका टाइम सिर्फ 38.7 सेकंड था, जो उस दौर के लिए काफी तेज़ माना जाता था। इस जीत ने न सिर्फ भारत को गौरव दिलाया, बल्कि देश में पैरालिम्पिक खेलों की जागरूकता भी बढ़ाई।
स्वर्ण पदक मिलने के बाद मूर्लीकांत कई स्कूलों और संस्थानों में गया, जहाँ उन्होंने बच्चों को तैराकी सिखाई और अपने अनुभव साझा किए। उनका मानना था कि शरीर की सीमाएँ नहीं, सोच की सीमाएँ हमें रोकती हैं। यही बात आज भी युवाओं को प्रेरित करती है।
वर्तमान में भी मूर्लीकांत पेटकर कई सामाजिक पहल में जुड़े हुए हैं। वह दिव्यांग अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं और खेल के माध्यम से समावेशी समाज बनाने की कोशिश करते हैं। उनका जीवन एक सच्ची मिसाल है कि कैसे कठिनाइयों को पार करके सफलता हासिल की जा सकती है।
अगर आप भी किसी बाधा का सामना कर रहे हैं, तो मूर्लीकांत की कहानी याद रखें – हार मानना नहीं, आगे बढ़ते रहना ही असली जीत है। उनके जैसा साहस और लगन हर भारतीय में होना चाहिए, तभी हमारा देश खेलों में और भी ऊँचा उठेगा।